महाराष्ट्र के सूखाग्रस्त गांवों में कैसे हैं हालात?
''मुझे किसी दूसरी जगह जाना होगा. शायद नारायणगांव या कोई और जगह. लेकिन अब जीवन चलाने के लिए यह अपना गांव तो छोड़ना ही होगा.''
सूखे से परेशान बहिनाबई ताप्से अपने गांव को छोड़ने के बारे में सोचने लगी हैं.
65 साल की बहिनाबई हिंगोली ज़िले के सातम्बा गांव की निवासी हैं. सातम्बा गांव में अधिकतर परिवार किसान हैं और ये एक मौसम में दो बार बीज बोने की प्रक्रिया पूरी करते हैं.
अगर आप अक्तूबर महीने में किसी गांव में जाएंगे तो शायद ही कोई आदमी घर पर मिले. दरअसल, इस मौसम में अधिकतर लोग अपने खेतों में होते हैं. लेकिन सातम्बा गांव का नज़ारा इसके उलट है.
यहां के ज़्यादातर लोग अपने-अपने घरों पर ही मौजूद थे. अपने घर के दालान पर बैठे ये ग्रामीण सूखे के बिगड़ते हालात से परेशान थे.
गांव के मुख्य चौक पर पहुंचकर हमने वहां कुछ लोगों से बात की.
बहिनाबई ने हमसे कहा, ''अगर आप सूखे की असली तस्वीर देखना चाहते हैं तो मेरे खेत में चलकर देखिए. मैं दिखाऊंगी असली सूखा क्या होता है.''
हम बहिनाबई के साथ उनके खेत की तरफ जाने लगे. रास्ते में हम खेतीबाड़ी के बारे में बातें करते रहे.
'क्या अब तीसरी बार बुआई करें?'
"हमारे पास पांच एकड़ ज़मीन है. हम यहां सोयाबीन और तूर की दाल उगाते हैं. पहले हमने सोचा की बारिश होगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ. इसके बाद हमने दोबारा बुआई के बारे में सोचा. इसके लिए हमने बैंक से लोन लिया. फिर हमने 15 दिन तक बारिश होने का इंतज़ार किया लेकिन ये इंतज़ार भी बेकार गया. अब हमारे पास कुछ भी नहीं है. हमारी फसल बर्बाद हो चुकी है.''
जब बहिनाबाई हमें यह सब बता रही थीं, उस दौरान मेरी नज़रें उनके खेतों को भी निहार रही थीं. मैंने देखा कि उनकी सोयाबीन की फ़सल पूरी तरह सूख चुकी है.
बहिनाबाई के पति विट्ठल ताप्से ने बैंक से 80 हज़ार रुपए का कर्ज़ लिया है. सूखे के चलते बहिनाबाई और विट्ठल ताप्से को बैंक का कर्ज़ चुकाने की चिंता सता रही है.
बहिनाबाई अपने आने वाले दिनों की योजनाओं के बारे में सोचने लगीं हैं. वो कहती हैं, ''यहां तो सूखा पड़ा है. हमें पेट भरने के लिए कुछ तो चाहिए. हमें किसी दूसरी जगह जाना पड़ेगा.''
बहिनाबाई की ख़रीफ़ फ़सल बर्बाद हुई थी. हमने उनसे पूछा कि वो रबी की फ़सलों के बारे में क्या सोच रही हैं.
इसके जवाब में उन्होंने कहा, ''हम रबी फ़सलों के बारे में कैसे सोच सकते हैं. हम पहले ही एक मौसम में दो बार बुआई कर चुके हैं और एक बार भी फसल काट नहीं पाए, अब तीसरी बार फसल बोने के बारे में कैसे सोचें.''
बहिनाबाई के परिवार में 6 सदस्य हैं और सभी खेती पर ही निर्भर हैं. उनके खेत में कोई कुआं नहीं है और फसल को पानी देने का कोई दूसरा ज़रिया भी नहीं है. उनकी खेती पूरी तरह से बारिश के पानी पर ही निर्भर है.
जिस वक़्त हम बहिनाबाई के खेत देख रहे थे. उस समय हमारे साथ गांव के एक और किसान धनजी घ्यार भी मौजूद थे.
धनजी अपनी व्यथा सुनाते हैं, ''हमारे पास पांच एकड़ ज़मीन है. इस बार बारिश ना होने की वजह से हम कुछ भी नहीं बो सके. हमने कर्ज़ लेकर दो बार बीज और खाद खरीदा और बोया लेकिन कुछ भी हासिल नहीं हुआ.''
धनजी बुज़ुर्ग हैं और इसलिए गांव छोड़कर नहीं जाना चाहते उनके पास एक ही विकल्प है, बारिश का इंतज़ार.
लेकिन कुछ जवान किसान जैसे कि विट्ठल घ्यार अब गांव छोड़ने के बारे में सोचने लगे हैं.
सूखे का विट्ठल पर कैसा असर पड़ा, इस बारे में वे बताते हैं, ''हमने दो बार बीज बोया लेकिन कुछ नहीं मिला. हमें लगा कि रबी के मौसम में शायद बारिश होगी लेकिन बारिश नहीं हुई. अब हम क्या कर सकते हैं. हमें गांव छोड़कर काम की तलाश में पुणे या मुंबई जाना ही होगा. हम पहले से ही क़र्ज़ के बोझ से जूझ रहे हैं और अब ज़्यादा क़र्ज़ नहीं ले सकते. हम कैसे जिएंगे और अपने बच्चों को कैसे पढ़ाएंगे. यही सवाल दिन-रात दिमाग में चलते रहते हैं.''
सातम्बा गांव हिंगोली से 12 किलोमीटर दूर है और इसकी आबादी 1200 है. गांव से लगी सड़क पर एक बोरवेल है. हमने उसके नल को खोला तो उसमें से पानी आने लगा.
हमने वहां आसपास खेल रहे बच्चों से पूछा कि क्या इस बोरवेल से अक्सर पानी आता है. उन्होंने हां में जवाब दिया और कहा कि उनके पास पीने के लिए पानी है.
सूखे से परेशान बहिनाबई ताप्से अपने गांव को छोड़ने के बारे में सोचने लगी हैं.
65 साल की बहिनाबई हिंगोली ज़िले के सातम्बा गांव की निवासी हैं. सातम्बा गांव में अधिकतर परिवार किसान हैं और ये एक मौसम में दो बार बीज बोने की प्रक्रिया पूरी करते हैं.
अगर आप अक्तूबर महीने में किसी गांव में जाएंगे तो शायद ही कोई आदमी घर पर मिले. दरअसल, इस मौसम में अधिकतर लोग अपने खेतों में होते हैं. लेकिन सातम्बा गांव का नज़ारा इसके उलट है.
यहां के ज़्यादातर लोग अपने-अपने घरों पर ही मौजूद थे. अपने घर के दालान पर बैठे ये ग्रामीण सूखे के बिगड़ते हालात से परेशान थे.
गांव के मुख्य चौक पर पहुंचकर हमने वहां कुछ लोगों से बात की.
बहिनाबई ने हमसे कहा, ''अगर आप सूखे की असली तस्वीर देखना चाहते हैं तो मेरे खेत में चलकर देखिए. मैं दिखाऊंगी असली सूखा क्या होता है.''
हम बहिनाबई के साथ उनके खेत की तरफ जाने लगे. रास्ते में हम खेतीबाड़ी के बारे में बातें करते रहे.
'क्या अब तीसरी बार बुआई करें?'
"हमारे पास पांच एकड़ ज़मीन है. हम यहां सोयाबीन और तूर की दाल उगाते हैं. पहले हमने सोचा की बारिश होगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ. इसके बाद हमने दोबारा बुआई के बारे में सोचा. इसके लिए हमने बैंक से लोन लिया. फिर हमने 15 दिन तक बारिश होने का इंतज़ार किया लेकिन ये इंतज़ार भी बेकार गया. अब हमारे पास कुछ भी नहीं है. हमारी फसल बर्बाद हो चुकी है.''
जब बहिनाबाई हमें यह सब बता रही थीं, उस दौरान मेरी नज़रें उनके खेतों को भी निहार रही थीं. मैंने देखा कि उनकी सोयाबीन की फ़सल पूरी तरह सूख चुकी है.
बहिनाबाई के पति विट्ठल ताप्से ने बैंक से 80 हज़ार रुपए का कर्ज़ लिया है. सूखे के चलते बहिनाबाई और विट्ठल ताप्से को बैंक का कर्ज़ चुकाने की चिंता सता रही है.
बहिनाबाई अपने आने वाले दिनों की योजनाओं के बारे में सोचने लगीं हैं. वो कहती हैं, ''यहां तो सूखा पड़ा है. हमें पेट भरने के लिए कुछ तो चाहिए. हमें किसी दूसरी जगह जाना पड़ेगा.''
बहिनाबाई की ख़रीफ़ फ़सल बर्बाद हुई थी. हमने उनसे पूछा कि वो रबी की फ़सलों के बारे में क्या सोच रही हैं.
इसके जवाब में उन्होंने कहा, ''हम रबी फ़सलों के बारे में कैसे सोच सकते हैं. हम पहले ही एक मौसम में दो बार बुआई कर चुके हैं और एक बार भी फसल काट नहीं पाए, अब तीसरी बार फसल बोने के बारे में कैसे सोचें.''
बहिनाबाई के परिवार में 6 सदस्य हैं और सभी खेती पर ही निर्भर हैं. उनके खेत में कोई कुआं नहीं है और फसल को पानी देने का कोई दूसरा ज़रिया भी नहीं है. उनकी खेती पूरी तरह से बारिश के पानी पर ही निर्भर है.
जिस वक़्त हम बहिनाबाई के खेत देख रहे थे. उस समय हमारे साथ गांव के एक और किसान धनजी घ्यार भी मौजूद थे.
धनजी अपनी व्यथा सुनाते हैं, ''हमारे पास पांच एकड़ ज़मीन है. इस बार बारिश ना होने की वजह से हम कुछ भी नहीं बो सके. हमने कर्ज़ लेकर दो बार बीज और खाद खरीदा और बोया लेकिन कुछ भी हासिल नहीं हुआ.''
धनजी बुज़ुर्ग हैं और इसलिए गांव छोड़कर नहीं जाना चाहते उनके पास एक ही विकल्प है, बारिश का इंतज़ार.
लेकिन कुछ जवान किसान जैसे कि विट्ठल घ्यार अब गांव छोड़ने के बारे में सोचने लगे हैं.
सूखे का विट्ठल पर कैसा असर पड़ा, इस बारे में वे बताते हैं, ''हमने दो बार बीज बोया लेकिन कुछ नहीं मिला. हमें लगा कि रबी के मौसम में शायद बारिश होगी लेकिन बारिश नहीं हुई. अब हम क्या कर सकते हैं. हमें गांव छोड़कर काम की तलाश में पुणे या मुंबई जाना ही होगा. हम पहले से ही क़र्ज़ के बोझ से जूझ रहे हैं और अब ज़्यादा क़र्ज़ नहीं ले सकते. हम कैसे जिएंगे और अपने बच्चों को कैसे पढ़ाएंगे. यही सवाल दिन-रात दिमाग में चलते रहते हैं.''
सातम्बा गांव हिंगोली से 12 किलोमीटर दूर है और इसकी आबादी 1200 है. गांव से लगी सड़क पर एक बोरवेल है. हमने उसके नल को खोला तो उसमें से पानी आने लगा.
हमने वहां आसपास खेल रहे बच्चों से पूछा कि क्या इस बोरवेल से अक्सर पानी आता है. उन्होंने हां में जवाब दिया और कहा कि उनके पास पीने के लिए पानी है.
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